कंस भगवान कृष्ण को क्यों मारना चाहता था?

 द्वापर युग के अंतिम चरण में धरती पर अत्याचारी राजाओं और दैत्यों का आतंक बहुत बढ़ गया था। उनके त्रास से मुक्ति दिलाने के लिए पृथ्वी और देवताओं की प्रार्थना पर क्षीरशायी परंब्रहम परमेश्वर भगवान विष्णु ने यदुकुल में वसुदेव-देवकी के पुत्र के रूप में उत्पन्न हो कर आततायी राजाओं और दैत्यों का नाश करने और अपने भक्तों को सुख प्रदान करने का आश्वासन दिया। उनके इस आश्वासन के बाद ब्रह्मा जी के आदेश के अनुसार अन्य देवताओं ने भी ब्रज क्षेत्र में ग्वालबालों के रूप में धरती पर अवतार ले लिया ताकि वे भी भगवान के मनुष्य रूप में किए गए लीलाओं का आनंद ले सकें।

लेकिन अब भगवान के अवतरण को शीघ्र संभव बनाने और उनके हाथों अत्याचारी राजाओं के नाश के लिए कारण उपस्थित करना देवताओं की चिंता थी। क्योंकि भगवान बिना कारण किसी का वध नहीं करते। इन दोनों कार्यों के लिए कारण बना मथुरा के अधिपति कंस को लक्ष्य कर किया गया एक आकाशवाणी।

बात ऐसी थी कि उस समय समस्त व्रज मण्डल वृषणी साम्राज्य के अंदर आता था जिसकी राजधानी मथुरा थी। वृषणी वंश को भोजवंश भी कहा जाता था (यह मध्यकालीन भोजवंश से अलग था)। यद्यपि ये भी यदु वंश की ही शाखा थे (यदु वंश की अनेक शाखाएँ थी जो अलग-अलग जगहों पर शासन करती थी) थे। पर अन्य यदु वंशियों की अपेक्षा इन्होंने अधिक शक्ति प्राप्त कर ली थी। इसलिए समस्त यदुवंशी वृषणी शासक को ही अपना अधिपति मानते थे और उन्हें राजस्व देते थे।

उस समय भोजवंश पर आहुक के पुत्र उग्रसेन का शासन था। उग्रसेन के भाई का नाम था देवक। कंस उग्रसेन का पुत्र था जो अपने पिता को बंदी बना कर राजा बन बैठा था।


उग्रसेन तो सात्विक और प्रजा का कल्याण चाहने वाला राजा था। लेकिन कंस अपने पिता के विपरीत बहुत अत्याचारी और पापकर्म करने वाला था। इस कार्य में उसका सहयोग उसके कई दैत्य मित्र किया करते थे। उसके दैत्य मित्रों में सबसे महत्वपूर्ण थेप्रलंबसूरबकासुरचानूणतृणावतीअघासुरमुष्टिकअरिष्टासुरद्विविदपूतनाकेशी और धेनुक। बाणासुर और भौमासुर आदि दैत्य राजाओं से भी उसके मैत्रीपूर्ण संबंध थे। मगध नरेश जरासंधजो उस समय के सबसे शक्तिशाली शासकों मे से थाभी उसका मित्र था।

कंस और उसके मित्रों के अत्याचारों से प्रजा बहुत त्रस्त थी। भगवान पहले ही यदुवंश के वसुदेव-देवकी के यहाँ अवतार लेने का वचन दे चुके थे। अतः देवताओं ने अपना कार्य यहीं से शुरू करने का निर्णय किया। यह कार्य शुरू हुआ वसुदेव-देवकी के विवाह के समय।

हुआ यह कि उग्रसेन के भाई देवक की पुत्री (कंस की चचेरी बहन) देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ। कंस को अपनी बहन देवकी से बहुत स्नेह था। वसुदेव का भी वह बहुत आदर करता था। इसीलिए देवकी जब विवाह के बाद अपने पति वसुदेवजी के साथ ससुराल मथुरा जाने लगी तो कंस स्वयं उनके रथ को हाँकने लगा। इसी समय उसे संबोधित करते हुए आकाशवाणी हुई अरे मूर्खजिसको तू रथ मे बैठा कर लिए जा रहा हैउसकी आठवें गर्भ की संतान तुझे मार डालेगी।

      इसी आकाशवाणी से कंस का कृष्ण से शत्रुता का आरंभ हुआ। यद्यपि अभी तक भगवान कृष्ण का धरती पर अवतरण भी नहीं हुआ था। 

 

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